Puneet Verma Poetry

नोटबंदी की पंक्तियाँ

देश की ये पंक्तियाँ, इक दिन कम हो जाएंगी
सब दूर दूर हो जाएंगे, और आँखें नम हो जाएंगी
जो अकेला था कभी, उदासी की छावँ में
साथ हमारे आज खड़ा है, शहर में और गाँव में
उसकी ये सूखी आँखें, इक दिन नम हो जाएंगी
जब रोता मासूम हँसेगा, चिंता कम हो जाएगी
सब दूर दूर हो जाएंगे, और आँखें नम हो जाएंगी

देश की खातिर आज खड़े हैं, पैसे तो बहाना है
उस पीतल की चिड़िया को हमने, सोने का बनाना है
आतंक का सर आज झुकेगा, छुरी मलहम हो जाएंगी
जब रोता मासूम हँसेगा, चिंता कम हो जाएगी
सब दूर दूर हो जाएंगे, और आँखें नम हो जाएंगी

हिन्दू मुस्लिम एक हुआ है, जो इनसे टकराएगा
टक्कर खा कर पंक्ति से , सर उसका चकराएगा
जिसमे तेरे प्राण फंसे हैं , वो माया भ्र्म हो जाएगी
जब रोता मासूम हँसेगा, चिंता कम हो जाएगी
सब दूर दूर हो जाएंगे, और आँखें नम हो जाएंगी

– पुनीत वर्मा की कलम से, मिशन ग्रीन दिल्ली ब्लॉग

पोल्लुशन की दौड़ में हमने , नंबर एक जो पाया है

धुंए का ये बादल देखो, हमने आज बनाया है
अर्जित नहीं किया है उतना, जितना आज गवाया है
शहर की अपने हुई तररक्की, दुनिया रह गई हक्की बक्की
पोल्लुशन की दौड़ में हमने , नंबर एक जो पाया है

इतना क्यों मजबूर हुए हम, पैदल चलना भूल गए
दो पैसे की अक्ल ना पाई, काहे हम सब स्कूल गए
अपनी अपनी कार घुसाकर, ट्रैफिक जैम लगाया है
पोल्लुशन की दौड़ में हमने , नंबर एक जो पाया है

काहे तू बस अपनी सोचे, अपनों की भी सोच ले
साँसे तेरी बंद हो रही, ऑक्सीजन का डोस ले
शहर को अपने नरक बनाया, क्या तूने आज कमाया है
पोल्लुशन की दौड़ में हमने , नंबर एक जो पाया है

गुस्सा अपना ख़तम करो अब, कार चलाना आज छोड़ दो
मेट्रो से भई ट्रेवल कर लो, खाली कर दो आज रोड को
भुगत रहे फल हरपल हमसब, कूड़ा जो फैलाया है
पोल्लुशन की दौड़ में हमने , नंबर एक जो पाया है

पटाकों का धुंआ उड़ाकर, चीन चीन बस चिल्ला रहे हो

मुख को अपने काला कर दे, ऐसी दिवाली मना रहे हो
फेसबुक पे शिक्षा दे कर, खुद को उल्लू बना रहे हो
दिल्ली वालों शर्म करो अब, धुंए का बादल बना रहे हो
पटाकों का धुंआ उड़ाकर, चीन चीन बस चिल्ला रहे हो

बच्चों को तुम आज देख लो, स्कूटी कैसे ड्राइव कर रहे
जान से सबकी ये खेल कर, डेथ पिट में डाइव कर रहे
कैसे रोकें इन बच्चों को, मात पिता क्या करा रहे हो
पटाकों का धुंआ उड़ाकर, चीन चीन बस चिल्ला रहे हो

कैब का ड्राइवर कार उड़ाए, उसको कुछ भी समझ ना आये
बच्चों की वो जान से खेले, कोई उसको चपत लगाए
कैसे रोकें इस ड्राइवर को, मैडम ये क्या करा रहे हो
पटाकों का धुंआ उड़ाकर, चीन चीन बस चिल्ला रहे हो

दिल्ली को तुम आज बचा लो, ट्रैफिक सिस्टम आज बना लो
वर्ना होगा शहर ये काला, मुख को अपने साफ़ करा लो
घंटों घंटों जाम में फंसकर, तुम बैठ के स्टीयरिंग हिला रहे हो
पटाकों का धुंआ उड़ाकर, चीन चीन बस चिल्ला रहे हो

सब कुछ जिसमे डूब रहा अब , काल का बादल वो देखो

छोटी छोटी बातों पर, मन करता है हल चल ये देखो
सब कुछ जिसमे डूब रहा अब , काल का बादल वो देखो
काल ये कोई और नहीं, जिसपर अपना जोर नहीं
तुझको भी ये ले जाएगा, मुझको भी ये ले जाएगा
अन्धकार में डूब रहा जग, कांप रहा सम तल वो देखो
सब कुछ जिसमे डूब रहा अब , काल का बादल वो देखो

अर्जुन को जो रूप दिखाएं, कृष्ण काल की बात बताएँ
सब कुछ हर दिन खत्म हो रहा, क्यों तू अपना राज दिखाए
तू जिसपर अपना प्यार लुटाए, खत्म हो रहा पल पल वो देखो
अन्धकार में डूब रहा जग, कांप रहा सम तल वो देखो
सब कुछ जिसमे डूब रहा अब , काल का बादल वो देखो

सोते सोते भय सताए, काल हमको निगल ना जाए
परमाणु की शक्ति से , धरती सारी पिघल ना जाए
ओपन हिमर याद कर रहा, कुरुक्षेत्र का स्थल वो देखो
अन्धकार में डूब रहा जग, कांप रहा सम तल वो देखो
सब कुछ जिसमे डूब रहा अब , काल का बादल वो देखो

Bharat Mata ki Jai

Bharat is the country of Bible and Geeta
Adorable shrine of Ram and Sita
Where gives the holy flying dove
The only message of peace and love

The desh with so much diversity
That laugh and loves, even in situation of adversity
Tend to forgive those, who try to remorse
Clean the thoughts, which make the situation worse

Let’s mark our attendence
On this day of Independence
Spread the love, expel out the bhay
Sar Utha ke Bolo, Bharat Mata ki Jai

छोड़ के सब कुछ इस मिटटी में , कहीं अचानक खो जाएगा

मन को अपने शांत करो अब , इतना क्यों तुम तड़प रहे हो
सबको जल्दी माफ़ करो अब , इतना क्यों तुम भड़क रहे हो
पल दो पल का खेल है सारा, खत्म तू पल में हो जाएगा
छोड़ के सब कुछ इस मिटटी में , कहीं अचानक खो जाएगा

क्यों तू इतने ख्वाब सजाए , इतने सारे महल बनाए
फसकर इन सब चीज़ों में, क्यों तू सर का भोझ बढ़ाए
प्रभु प्रेम का गाना सुनकर, पल में अब तू सो जाएगा
छोड़ के सब कुछ इस मिटटी में , कहीं अचानक खो जाएगा

निकल जा घर से लोक भ्रमण पर , जीवन अपना आज तू जी ले
छोड़ के सब कुछ जैसा तैसा, ग्रीन टेक का प्याला पी ले
मिशन ग्रीन की कविता सुनकर , मुक्त अभी तू हो जाएगा
छोड़ के सब कुछ इस मिटटी में , कहीं अचानक खो जाएगा

भूल के सारी दुनिआ को, वर्मा कविता लिख रहा है
दिल्ली का हर शांत हृदय अब , मिशन ग्रीन पे दिख रहा है
अंधकारमय बुद्धि में अब, आज सवेरा हो जाएगा
छोड़ के सब कुछ इस मिटटी में , कहीं अचानक खो जाएगा

अपनी तो खत्म हो गयी, अब आपकी बारी है

खुदा की मोह्हबत में , मदहोश कायनात सारी है
जब तक वो साथ है, जशने-जिंदगी जारी है
जीवन की जेल में, वर्ना हम जीते कैसे
दर्द ये जीवन का, वर्ना हम पीते कैसे
अपनी तो खत्म हो गयी, अब आपकी बारी है

कहता है अपना ये मन, फिर आपको बुलाऊँ मैं
टकराऊं मेह के प्यालों को, शराब को ड्ढलाऊँ मैं
बंदिश मुघसे जीवन की, क्यों सहन नहीं होती है अब
सोने की ये झूठी लंका, क्यों दहन नहीं होती है अब
नाटक इस जीवन का, देखो अब तक जारी है
अपनी तो खत्म हो गयी, अब आपकी बारी है

करता हूँ सलाम सबको, तो फिर मैँ अब चलता हूँ
डूबते हुए सूरज के साथ, तो फिर मैँ अब ढलता हूँ
हाज़िर कर दूँ खुद को अब, खुदा के दरबार में
खुशियां आएं जीवन में, और इस संसार में
वर्मा के इन् होठों पर , देखो कविता जारी है
अपनी तो खत्म हो गयी, अब आपकी बारी है